Saturday, October 05, 2019

लोकतन्त्र में शक्ति का स्रोत जन-प्रतिनिधि नहीं, बल्कि स्वंय जनता है


जब जनता शासन हेतु कुछ व्यक्तियों को जनप्रतिनिधि चुनती है तो उन्हें प्रशासन के सुचारू रूप से सञ्चालन में बाधा न होइसलिए कुछ अधिकार और विशेषाधिकार भी देती हैपर साथ में जनता अपना विकासन्याय आदि की जिम्मेदारी भी जनप्रतिनिधियों को सौंपती है। जिससे प्राकृतिक संसाधनों का जनता के हित में प्रयोग और संरक्षण होजनता अपनी अभिव्यक्तिपर्यावरण और संस्कृति को कायम रखने हेतु स्वतंत्रता का उपयोग करे और समाज में समृधिशांति- सदभावना का प्रसार हो।

जब जन-प्रतिनिधि अपनी जिम्मेदारी और कर्तव्य को जान-बूझकर नज़र अंदाज़ करने लगें और अपने निहित स्वार्थों की पूर्ति हेतु पद और विशेषाधिकार का दुरूपयोग करने लगें। जनता के इस सब के विरोध करने पर कानून के नाम पर जन-प्रतिनिधि जनता के विरुद्ध शक्ति का प्रयोग करने लगेवे भूल जायें कि शक्ति का स्रोत वे नहींबल्कि स्वंय जनता हैजो उन्हें समाज के सामूहिक हित में सौंपी हैतो यह समझना चाहिए कि जन-प्रतिनिधि जनता का हित नहीं कर रहेबल्कि शोषक और उत्पीडक बन गए हैं।

ऐसे में उन्हें ये समझाना ज़रुरी है कि सत्ता उनकी बपौती नहीं है। बल्कि जनता का सामूहिक अधिकार है जिसे कुछ समय के लिए जनप्रतिनिधियों को सौंपी गे है। जनता जब चाहेइसे वापस ले सकती है। जो बहुमत कानून बनाने का और शासन करने का अधिकार देती हैउसे अधिकार है कि वो अपने प्रतिनिधियों द्वारा बनाये गए नियमों और कानूनों को मानने से इंकार कर देजब उसका उदेश्य पूरा न हो।

इसके लिए चुनाव पर निर्भर होकर अच्छे लोगों के चुने जाने का इंतज़ार करने की बाध्यता जनता को नहीं है। क्योंकि चुनाव धन और बाहुबल का एक घिनौना आयोजन मात्र बनकर रह गया है। और ऐसे मेंयदि राज-सत्ता जनता की अभिव्यक्ति और विरोध का दमन करेतो जनता को पूरा हक है कि ऐसे कानून और नियम कि अवहेलना करेऔर जब कोई चारा न होतो हर प्रकार से राज-सत्ता को उखाड फेंके। ये देश विरोधी नहींबल्कि जनता के हित में हैऔर जनता का हित ही सर्वोपरि है।

– उलगुलान डेस्क 

तस्वीर प्रतीकात्मक लैंड वाच एशिया से साभार।