Wednesday, March 20, 2019

"जयपाल सिंह के साथ इतिहासकारों ने न्याय नहीं किया" - विनोद कुमार

         तस्वीर आदिवासी लेखिका वंदना टेटे की वाल से साभार।       



















जयपाल सिंह के बारे में भ्रम बनाया गया है। जययपाल सिंह जितने बड़े कद काठी के नेता थे, उतनी जानकारी मुख्यधारा के बौद्धिक समाज में उनके बारे में नहीं। किसी से आप पूछेंगे, तो तीन चार लाईन में उन्हें निपटा दिया जायेगा। वे हॉकी के एक महान खिलाड़ी थे। झारखंड पार्टी के नेता थे। और जो सबसे लोकप्रिय प्रवाद उनके बारे में है कि उन्होंने झारखंड आंदोलन को अपनी विलासिता के लिए बेच दिया। विडंबना यह कि उनके दौर के कई अन्य झारखंडी बुद्धिजीवी भी उनके बारे में यही राय रखते हैं।

आप उसे मुख्यधारा के इतिहासकारों की एक गहरी साजिश भी कह सकते हैं। वरना एक ऐसा शख्स जो हॉकी के महानतम खिलाड़ियों में से एक है, एक छोटे से आदिवासी गाँव से निकल कर जो आक्सफोर्ड से अर्थशास्त्र का गोल्ड-मेडलिस्ट बनता है, जो काँग्रेस की लोकप्रियता को चुनौती दे, 1952 और 57 के विधानसभा चुनाव में 34 सीटें जीत कर काँग्रेस का सफाया कर देता है। जो संविधान सभा के सदस्य के रूप में अपने समानांतर अंबेडकर सहित किसी अन्य नेता से कम प्रखर नहीं, को तीन चार पंक्तियों में निपटा देना एक क्रूर मजाक नहीं तो क्या है?

आज हम आपसे संक्षेप में सिर्फ उस आरोप की चर्चा करेंगे जिसमें कहा जाता है कि उन्होंने काँग्रेस के साथ पार्टी का विलय कर बहुत बड़ी भूल की। दरअसल, झारखंड की आज की राजनीति और उसकी नियति को समझने के सूत्र वहीं से निकलते हैं।

1957 के चुनाव में जयपाल सिंह की ‘झारखंड पार्टी’ को 34 सीटें मिली थी, जो किसी भी झारखंडी पार्टी के लिए आज भी कल्पनातीत है। लेकिन 62 के चुनाव में उनकी संख्या घट कर 22 हो गई और सांसदों की संख्या भी पाँच से घट कर चार हो गई। और इन 22 में से भी 12 विधायकों को काँग्रेस ने खरीद लिया। यानी, वही खेल जो आज भी कभी भाजपा खेलती है, कभी काँग्रेस। और गहरी निराशा के इन्हीं क्षणों में उन्होंने नेहरू के वादों पर भरोसा कर काँग्रेस के साथ अपनी पार्टी का विलय कर दिया। हालाँकि नेहरु के जीवन काल में ही उन वादों को सिरे से नकारा जाने लगा।

क्या यह जयपाल सिंह की विलासिता थी?

दरअसल, झारखंड का इलाका मूलत: आदिवासियों का था। लेकिन धीरे-धीरे उस आदिवासी समुदाय और उनके साथ सदियों से रहने वाले अन्य समुदायों में विभाजन होना शुरु हो गया। कुड़मी आदिवासियत से मुक्ति चाहते थे। दलित भी हिंदू वर्णव्यवस्था के सबसे निचले पायदान पर रहने के बावजूद खुद को आदिवासियों से श्रेष्ठ समझने लगे। मुस्लिम आबादी ‘अंसार’ भी क्या अफगान और ईरान से आई थी? वे भी आदिवासी समाज के ही हिस्सा थे। लेकिन मुसलमान बनने के बाद उन्होंने दाढी रख ली, लुंगी लपेट ली।

ये झारखंडी समाज की दरारें हैं जिसे बाहर से आने वाली हर पार्टी उभारने की कोशिश करती है और आसानी से उसमें सफल भी हो जाती है। यहाँ के कुडमियों को समझाया जाता है कि वे तो शिवाजी के वंशज हैं। कोयरियों को समझाया जाता है कि वे तो मध्य-बिहार से आये प्राणी हैं। मुसलमान तो धर्म के आधार पर अपना भविष्य दुनियां के मुसलमानों के साथ देखने लगता है।

52 और 57 के चुनावों में बुरी तरह शिकस्त खाने के बाद काँग्रेस अपनी शातिर चालें चलने लगी और वह सब किया जो आज भाजपा कर रही है। आप जयपाल सिंह की बेबसी को समझ सकते हैं। जिन बारह विधायकों को काँग्रेस ने तोड़ा, उनमें से अधिकतर झारखंड के ही गैर-आदिवासी थे।

विनोद कुमार

वे लेखक, पत्रकार औऱ सोशल एक्टिविस्ट हैं। अभी हाल में ही उनकी पुस्तक झारखंड के आदिवासियों का संक्षिप्त इतिहास प्रकाशित हुई है। उनके बारे में अधिक जानकारी के लिए आप उन्हें फेसबूक पर फॉलो कर सकते हैं।

यह लेख उनकी नई किताब 'झारखंड के आदिवासियों का संक्षिप्त इतिहास' का ही एक छोटा सा अंश है, जो उनकी वाल से साभार लिया गया है।