Thursday, January 31, 2019

मीडिया भी हिंदू महासभा की तरह घृणा करती है गांधी से


हिंदू महासभा ने गांधी के पुतले पर गोली चला कर उनकी हत्या के जख्म को ताजा कर दिया और उनकी तस्वीर खूब चली सोसल मीडिया में और टीवी के चैनलों पर। जाहिर है कि उन्होंने गांधी के प्रति अपनी घृणा का खुल कर प्रदर्शन किया।

लेकिन यही काम आज स्थानीय मीडिया और हिंदी के तमाम अखबारों ने किया। किसी अखबार ने बापू की शहादत दिवस पर उन्हें याद करने या उनके प्रति अपनी श्रद्धांजलि अर्पित करने की जरूरत नहीं समझी। 

यहां तक कि प्रभात खबरने भी नहीं, जिनके पूर्व प्रधान संपादक और अब राज्यसभा के उपाध्यक्ष बन गये हरिवंश चार दिन पहले यहां के एक समारोह में यह बता गये कि ‘‘गांधी दुनियां के लिए विकल्प नहीं, मजबूरी’’, ‘‘गांधी सदा प्रासांगिक और प्रेरणास्रोत रहेंगे’’ लेकिन चार दिन बाद गांधी के शहादत दिवस पर गांधी को भुला कर मीडिया ने बता दिया कि गांधी की जरूरत अब उन्हें नहीं रही।

हो सकता है,मीडिया यह कहे कि उनके पास गांधी के शहादत दिवस पर कोई सरकारी विज्ञापन गांधी की तस्वीर के साथ नहीं आया और गांधी को याद करते हुए किसी समारोह की तस्वीर नहीं आई तो वे क्या समाचार गढ़ते? यह सचमुच बाजिब तर्क है। लेकिन इसका निहितार्थ हुआ यह कि भाजपा के सत्ता में आते ही गांधी के प्रति अवमानना शुरु हो गई। 

यह अलग बात कि परंपरा का निर्वाह करते हुए प्रधानमंत्री कल सुबह राजधाट जा कर फूलमाला चढ़ा आये थे। लेकिन संघ परिवार के हृदय में गांधी के प्रति वही घृणा है जिसकी चरम अभिव्यक्ति हिंदू महासभा ने की।
लेकिन मीडिया में बैठे तमाम लोग भी हिंदू महासभा की तरह गांधी से नफरत करते हैं? ऐसा लगता तो नहीं। कुछ लोगों को भले ही गांधी से नीतिगत विरोध हों। लेकिन गांधी से इस हद तक घृणा कि पूरे अखबार में गांधी की एक तस्वीर न हो? गांधी के लिए वे थोड़ी सी जगह निकाल सकते थे, किसी अन्य साधु-संत की खबर घटा कर। गांधी भी तो साबरमती के संतके रूप में भी याद किये जाते हैं।  

इसी तरह का आचरण मीडिया का बिरसा के प्रति भी उनकी जयंती 15 नवंबर के दिन दिखा था। किसी भी अखबार में बिरसा का कोई भव्य चित्र नही छापा उस दिन। इसलिए मामला सिर्फ घृणा का नहीं। बिरसा या गांधी बाजार के अनुकूल नहीं पड़ते। उनकी नीतिया कारपोरेट को सूट नहीं करती। जाहिर है कारपोरेट पोषित मीडिया में उनके लिए जगह नहीं।

समस्या यह भी है कि यदि गांधी के हत्यारों के बगलगीर हो कर हम गांधी की महानता की याद दिलायेंगे, तो उसका जन साधारण पर असर भी नहीं पड़ेगा। बिरसा का जयकारा यदि हम बिरसा के अबुआ दिसोम, अबुआ राजके सूत्र वाक्य का कब्र खोदने वालों के साथ मिल कर लगायेंगे तो वह अपना अर्थ खो देगा।

गांधी और बिरसा की त्रासदी यही है।

विनोद कुमार