Thursday, January 24, 2019

ईसाई आदिवासी नक्सली हैं, ऐसा कहना बिल्कुल गलत है!

पिछले दिनों साथी Gani Manjhi के एक पोस्ट में चर्चित लेखिका मधु किश्वर का एक वक्तव्य देखने को मिला जिसमें कहा गया था कि मध्य भारत के ईसाई आदिवासी नक्सल हैं। यह ज्ञान उन्हें कहां से मिला यह समझ से परे है। किसी समाजशास्त्री ने यह बात पूर्व में कही होयह मुझे देखने को नहीं मिला। हांयह धारणा शहरी बुद्धिजीवियों के द्वारा जरूर बनाई और फैलायी गई है कि आदिवासी नक्सली हैं या माओवादी आदिवासियों के हितों की रक्षा के लिए संघर्ष कर रहे हैं। हालांकि यह भी एक अधूरा सच ही है।

ईसाई को नक्सल कहने से सम्बंधित मधु किश्वर का एक ट्विट यह भी।

दरअसल, आरएसएस और संघ परिवार हिंदू मतों के अपने पक्ष में ध्रुवीकरण के लिए एक तरफ तो मुसलमानों को टारगेट कर रहा है और दूसरी तरफ आदिवासीबहुल इलाकों में ईसाईयों को। उन पर आरोप लगाया जाता है कि वे आदिवासियों का धर्मांतरण कर रहे हैं। वे चाहते हैं कि आदिवासी आर्थिक रूप से विपन्न और पिछड़े बने रहें, इसलिए वे विकास का विरोध करते हैं। 

हाल के दिनों में खूंटी में चले पत्थरगड़ी आंदोलन को भटकाने का भी आरोप उन पर लगाया गया। मदर टरेसा के आश्रम पर यह आरोप लगाया गया कि वे नवजात शिशुओं को बेचते हैं। मधु किश्वर का एक कार्यशाला में दिया गया वक्तव्य भाजपा सरकार के इसी प्रोपगेंडा को हवा देता है।

यह सही है कि ईसाई आदिवासी समूह जल, जंगल, जमीन को बचाने की लड़ाई में अगुवा दिखाई देता है, लेकिन यह बात भी कई बार सामने आया है कि चर्च सरकार से पंगा लेने के मूड में नहीं रहता। भरसक बच कर ही चलता है। लेकिन चूंकि ईसाई आदिवासी युवा पढ़े लिखे और प्रबुद्ध हैं, इसलिए वे मुखर हैं और जन आंदोलनों में उनकी भागिदारी भी रहती है। चाहे वह ईचा बांध के खिलाफ आंदोलन हो या तपकारा या नेतरहाट फायरिंग रेंज के खिलाफ चल रहा आंदोलन हो। 

लेकिन ये तमाम आंदोलन पूरी तरह व्यापक जन भागिदारी वाला और शांतिमय रहा है। हां, सरकार की कोशिश जरूर रहती है कि उनके दमनात्मक कार्रवाईयों से हिंसा भड़के और उन्हें जन आंदोलनों को कुचलने का मौका मिले और सरकार विकास के नाम पर जल,जंगल,जमीन की लूट कर सके। मधु किश्वर ईसाई आदिवासियों को नक्सल बता कर सरकार के इसी मुहिम का हिस्सा बन रही हैं।

रही आदिवासियों के माओवादियों के प्रभाव में रहने की बात, यह भी मिथ्या ही है। जो आदिवासी उनके प्रभाव में गये, उनका वहां क्या उपयोग होता है, इसका खुलासा कई लोगों ने किया है। हम आपका ध्यान हाल की एक राजनीतिक परिघटना की तरफ दिलाता हूं। आप सब जानते हैं कि छत्तीसगढ़ की पूरी कांग्रेस टीम का सफाया कुछ वर्ष पूर्व माओवादियों ने कर दिया था। लेकिन चंद ही वर्षों बाद पिछले चुनाव में बस्तर सहित छत्तीसगढ़ में कांग्रेस को विशाल बहुमत से जनता ने सत्ता में पहुंचा दिया।

इसका क्या अर्थ हुआ ?

एक तो यह कि किसी तरह के बुनियादी बदलाव के लिए सफायाकाम नहीं आता। बदलाव एक अंदरुनी प्रक्रिया है।

दूसरा नतीजा यह कि छत्तीसगढ़ की जनता, जिसमें आदिवासी बहुल इलाके भी हैं, माओवादी हिंसा के साथ नहीं। यह अलग बात कि सत्ता के उत्पीड़न और जनवादी आंदोलनों के कुंद पड़ने की वजह से निराशा और हताशा के चरम क्षणों में कोई माओवादियों के शरण में पहुंच जाता है, लेकिन यह निष्कर्ष निकालना कि माओवादी आदिवासियों के संरक्षक हैं, या आदिवासी नक्सली है, बिल्कुल गलत है।

एक बात गांठ बांध लीजिये कि तीर-धनुष रख कर भी आदिवासी हिंस्र नहीं।

 – विनोद कुमार  की वाल से साभार 

(विनोद कुमार लेखक, पत्रकार और सामाजिक कार्यकर्ता हैं। वर्तमान में, वे रांची में रहते हैं।)