Sunday, December 23, 2018

शर्मनाक घटनाओं को अंजाम देने वाले समाज की तस्वीर कब बदलेगी?

पंद्रह साल की एक लड़की को जिंदा जला दिया। दसवीं क्लास में पढ़ने वाली उस लड़की के पिता एक जूते की फैक्ट्री में काम करते हैं। उस लड़की से किसे दिक्कत थीजूते की फैक्ट्री में काम करने वाले पिता की दसवीं में पढ़ती और साइकिल से स्कूल आती-जाती बेटी से किसे दिक्कत थीपिता का कहना है कि उनकी किसी से दुश्मनी नहीं थी।

एक ऑटोमेटिक बर्ताव की तरह यह इस सड़ांध से भरे समाज के खून में घुली है। लड़की है... जूते की फैक्ट्री में काम करने वाले व्यक्ति की बेटी है... साइकिल चला कर स्कूल जाती है... दसवीं तक पढ़ाई भी कर चुकी है...!


यानी आने वाले वक्त में उसकी पीढ़ी का हुलिया बदल जा सकता है। फिर गुलामी कौन करेगा... एक औरत की शक्ल में मर्द की... और एक नीच कही जाने वाली जात की शक्ल में ऊंच कही जाने वाली जात की..! उस कुदरती मर्द कीजो है... और उस फर्जी जात की भी... जो नहीं है..!


ये 2018 के दिसंबर की हकीकत है और कुछ विद्वान लोग यह दावा उल्टी करते दिख जाते हैं कि अब पहले की तरह की सामाजिक तस्वीर नहीं रही..! हां... पहले की तरह नहीं रही... बस उसमें डिजिटल छौंक लग गई है... जुल्म के तौर-तरीके जरा और परिष्कृत हो गए हैं... बर्ताव एक ओर सीधे जिंदा जला देने का है तो दूसरी ओर शक्कर में घोल कर मीठी जुबान से जहर पिला देने का है...! लेकिन इस सबसे शर्मनाक समाज की तस्वीर शायद नहीं बदलनी है..!

बिना मकसद उस बच्ची को जिंदा नहीं जला दिया गया! इस समाज के बर्बर पंडावादी ढ़ांचे को बनाए रखने के लिए इस तरह के अपराध होते रखने की एक सुनियोजित व्यवस्था लागू है! एक हत्या ने अपनी व्यवस्था के संदेश को समूचे समाज में देने की कोशिश की है!

दलित-वंचित जातियों-तबकों के बच्चों को गुलामी करने की व्यवस्था चलाने वालों को यह कैसे बर्दाश्त हो सकता था कि वह लड़की या उसका परिवार स्कूल पढ़ने जाए और दुनिया में सिर उठा के जीने का सपना देखे!

उन बर्बर और अविकसित दिमाग वाले अमनुष्यों की सत्ता सिर्फ इससे हिलती है कि कोई दलित पढ़ाई करेधन अर्जित करेअच्छे कपड़े पहनेअच्छा दिखेअपनी गाड़ी पर सफर करे... सवर्णों की गुलामी करने के बजाय अपने भरोसे जीए..!

सिर्फ इसीलिए देश की सरकार से लेकर समाज के सरकारों ने यह रास्ता बनाया कि अलग-अलग शक्लों में किसी भी रास्ते उन्हें मार डाला जाए..! व्यवस्थागत रूप से आर्थिक रूप से तोड़ने से लेकर जिंदा जला देने तक के इंतजाम उसी राजनीति का हिस्सा हैं!

लेकिन दिक्कत यह है कि अब आजादी और जीने के सपने के सफर को पीछे लौटाना मुमकिन नहीं रह गया है.!

– अरविंद शेष की वाल से साभार