Saturday, September 08, 2018

क्यों भारत में आज भी हर तीन व्यक्ति में एक व्यक्ति असाक्षर है?

यूनेस्को के मुताबिकसाक्षरता एक आधारभूत मानव अधिकार और आजीवन सीखने की नींव है। सामाजिक और मानव विकास के लिए जीवन को बदलने की क्षमता के लिए यह पूरी तरह से आवश्यक है। यह भी कहा जाता है कि आज के बच्चेकल के जिम्मेदार नागरिक बनेंगे। हम यह भी जानते हैं कि बिना शिक्षा और ज्ञान के कोई समाज आगे नहीं बढ़ता। ऐसे में आज भी लाखों बच्चे आज भी लिखना पढ़ना नहीं जानते। अर्थात साक्षर नहीं है। साक्षरता का हालाँकि हर देश में अलग अलग पैमाना हैपर अपनी समझ के साथ व्यक्ति का लिख-पढ़ पाना साक्षर होना है।

तस्वीर झारखण्ड बचाओ से साभार।
भारत एक लोकतंत्र है। किस लोकतंत्र के सफल होने की बुनियादी शर्त होती है जागरूक और जिम्मेदार नागरिक। जागरूकता और जानकारी इंसान का प्राथमिक स्रोत आज के युग में पढाई-लिखाई करना।आज भी भारत में बच्चे स्कूल नहीं जा पाते। उनके अभिभावक कई कारणों से आज भी अपने बच्चों को साक्षर बना पाने में असमर्थ हैं, तो उसके कई कारण है। एक कारण तो आज भी है, वंचित समुदायों में शिक्षा को लेकर जागरूकता का आभाव, और दूसरा कारण है, सरकारी स्कूलों की दयनीय स्थिति।
हालाँकि भारत सरकार ने एक कानून बच्चों को नि: शुल्क और अनिवार्य शिक्षा अधिनियम या शिक्षा का अधिकार अधिनियम (आरटीई) के तहत 4 अगस्त 2009 से इसे एक मौलिक अधिकार का दर्जा भी दे दिया है। भारतीय संविधान में इसे संशोधन कर अनुच्छेद 21ए को शामिल किया गया है जिसके अनुसार, भारत में 6 से 14 वर्ष के बच्चों को पढाई का अधिकार है।
लेकिन सच यह भी है कि मात्र संविधान में संशोधन होने से अथवा नए अधिनियम के बन जाने से भी यदि उसे जमीन पर ठीक से लागू नहीं करने से ऐसा संभव होना मुश्किल है। सरकार द्वारा उपलब्ध कराये गए सरकारी स्कूल की स्थिति आज भी अच्छी नहीं कही जा सकती। इसमें केन्द्रीय विद्यालय और विशेष प्रकार के विद्यालय जैसे नवोदय विद्यालय आदि अपवाद हो सकते हैं।

सीआईए के वर्ल्ड फैक्टबुक के हवाले तथा वर्ल्डबाय मैप में दिए गए विवरण के अनुसार, विश्व के 160 देशों की सूची में भारत का स्थान 124वां है। इस सूची में न केवल चीन, बल्कि म्यांमार, श्रीलंका जैसे देश भी हमसे आगे हैं जिनका स्थान क्रमशः 54वां, 82वां और 83वां है।  हालाँकि नेपाल, बांग्लादेश और पाकिस्तान जैसे पडोसी देशों से जरुर भारत की स्थिति बेहतर है।

भारत में सरकारी स्कूल की स्थिति ठीक नहीं कही जा सकती। सरकारी स्कूल पहले तो सुविधाओं के अभाव में अभिभावकों प्रेरित नहीं कर पाता कि वे अपने बच्चे वहां भेजें। फिर सरकार शिक्षक-विद्यार्थी अनुपात को बनाये रखने के लिए, शिक्षकों की कमी भी कर देती है। स्कूल की स्थिति और भी ख़राब हो जाती है, ऐसे में विद्यार्थी और भी कम हो जाते हैं। आखिर में सरकार विद्यार्थियों की संख्या के कम होने का हवाला देकर, उसे बन्द कर देती है। इस तरह से सरकार एक षड्यंत्र की तरह स्कूलों को बन्द करती जा रही है और प्राथमिक शिक्षा की अपनी जिम्मेदारियों से बचने का प्रयास करती है।
विद्यालय में शिक्षकों के पद रिक्त होना, शिक्षकों को गैर-शैक्षिक कार्यों में लगाना, नियमित शिक्षकों की जगह पारा-शिक्षकों से काम चलाना, पारा-शिक्षकों को वेतन बढ़ाने के लिए लगातार आंदोलनों में व्यस्त रहना आदि ऐसे कारण हैं कि शिक्षा की गुणवत्ता की स्थिति को और भी ख़राब करती है।
अगर कोई स्कूल, सुविधाओं और शिक्षकों की कमी झेल रहा है, ऐसे में उसे बेहतर सुविधा, शिक्षक और मोनिटरिंग के माध्यम से बेहतर किया जा सकता था, जिससे अभिभावक अपने बच्चों को सरकारी स्कूल में भेजते। लेकिन दुर्भाग्य है कि अभिभावक सरकारी स्कूल की जगह अपने बच्चों को आसपास के निजी स्कूल में भेज रहे हैं।
यह वे लोग भी कर रहे हैं जो गरीबी रेखा की नीचे जीवन बसर कर रहे हैं। इसका अर्थ है कि अभिभावक बच्चों की शिक्षा के लिए चिंतित होते हैं, पर जब वे यह महसूस करने लगते हैं कि सरकारी स्कूल की स्थिति दो कमरों के निजी स्कूल से भी गई-बिती  है, तो ऐसा करने को मजबूर होते हैं। 
यही कारण है कि एकतरफ सरकारी स्कूल पर लोगों का भरोसा कम होता जा रहा है, वहीं निजी स्कूल में विद्यार्थियों की संख्या बढ़ रही है। आह शहरों से लेकर गांवों तक निजी स्कूलों की बाढ़ सी आ गयी है। अतः शिक्षा की ज़रूरत लोग पहले से ज्यादा समझ रहे हैं, पर सरकार लोगों की जरुरत और आकांक्षा के मुताबिक गुणवत्ता पूर्ण शिक्षा उपलब्ध करवाने में लगातार पिछड़ती जा रही है।