Monday, September 24, 2018

सरकार की प्राथमिकता गर्भवती महिलाओं का स्वस्थ्य है या मुफ्त लैपटॉप-कंप्यूटर बांटना

सरकार की प्राथमिकता क्या है? आदिवासी, दलित एवं गरीब जनता की अत्यावश्यक आवश्यकताओं को पूरा करना या ख़ास और विशेषाधिकार प्राप्त वर्गों को मुफ्त सुविधायें दिलाना? पांच वर्ष पूर्व स्वास्थ मंत्रालय और जनजातीय विकास मंत्रालय द्वारा गठित एक विशेषज्ञ कमेटी ने अपनी जो रिपोर्ट जारी दी है, वह भयानक है। रिपोर्ट के अनुसार, जो बातें समझ में आती हैं, वे हैं:  

(1) देश के कुल मलेरिया प्रभावित लोगों में से 30 फीसदी आदिवासी हैं। (2) मलेरिया से कुल जितनी मौतें होती हैं, उनमें पचास फीसदी आदिवासी हैं, जबकि आदिवासी आबादी का अनुपात कुल आबादी का महज 9 फीसदी से भी थोड़ा कम है। (3) देश में गैर आदिवासी आबादी में प्रति एक लाख में 256 लोग टीबी के शिकार हैं, तो आदिवासी आबादी में प्रति लाख 703 लोग टीबी के शिकार हैं। 




(4) नवजात शिशुओं की मृत्यु दर गैर आदिवासी आबादी में प्रति हजार 34 है, तो आदिवासी आबादी में प्रति हजार 44.4 है। (5) 15 से 19 वर्ष की आयु के आधी से अधिक आदिवासी लड़कियां अंडर वेट हैं। (6) गैर आदिवासी आबादी का करीबन 20.5 फीसदी गरीबी रेखा के नीचे जीवन बसर करता है, वही आदिवासी आबादी का 40.6 फीसदी।

(7) झारखण्ड सरकार इस सितम्बर महीने को 'पोषण माह' घोषित की है। सरकारी योजना के अनुसार, हर स्तनपान कराने वाली माताओं को 700 ग्राम और गर्भवती महिलाओं को 900 ग्राम का 24 पौष्टिक पैकेट प्रति माह उपलब्ध करना है। लेकिन वास्तविकता यह है कि गत जून महीने से इस योजना के 23 लाख लाभार्थी महिलायें, इस पौष्टिक भोजन से वंचित हैं क्योंकि ये पैकेट गावों के आंगनवाड़ी को भेजे नहीं जाते हैं।

ये दुखद परिस्थिति है और यह गंभीर प्रश्न उठाती है कि झारखण्ड सरकार की प्राथमिकता क्या है? क्या आदिवासी, दलित एवं गरीब जनता की अत्यावश्यक आवश्यकताओं को पूरा करना या मेधावी छात्रों को लैपटॉप कंप्यूटर मुफ़्त देना एवं शिक्षकों को टेबलेट कंप्यूटर मुफ़्त देना इत्यादी?

– स्टेन स्वामी

(लेखक सामाजिक कार्यकर्त्ता हैं और रांची में रहते हैं। वे मानवाधिकार, खाशकर झारखण्ड में आदिवासियों के अधिकारों पर आवाज उठाने के लिए जाने जाते हैं।)