Thursday, May 17, 2018

एक बच्ची की मौत की कीमत सिर्फ 50 हज़ार, पुलिस ने भी नहीं दर्ज की प्राथमिकी

देश मे कानून का राज है पर आम लोगो की पहुँच से कानून आज भी काफी दूर है इस कारण आज देश में कई घटनाएं आम लोगों तक सामने नहीं आ पाती। वह तो शुक्र है सोशल मीडिया और उसके प्रति आम लोगों का क्रेज का, जो कोई भी फटी-पुरानी, शहर-गाँव का फोटो अथवा बयान सोशल मीडिया पर शेयर कर देते है और वह एक कहानी बन जाती है। यहाँ एक ऐसी ही एक घटना का विवरण है। 

झारखंड के कोडरमा जिला के डोमचांच प्रखंड में एक गांव है बंगाखलार। यह गांव घने जंगलों से घिरा हुआ है और ढाब थाना क्षेत्र में आता है। गांव की हालात यह है कि मोबाइल के टावर तक नहीं है। गांव जाने के लिए एक लाइन वाली पतली सड़क है। इस गांव में एक निजी विद्यालय सावित्री बाई फुले विद्यालय है जिसे लापरवाह तरीके से पैसे के पुजारियों द्वारा चलाया जा रहा है जिनका मकशद अर्थोपार्जन है।

इस विद्यालय में 28 जनवरी, 2018 को एक बच्ची कविता कुमारी (12) का नामांकन होता है। विद्यालय में नामांकन शुल्क के बतौर 700 रुपया, मासिक शुल्क 300 रुपया और यात्रा किराया 300 रुपया जमा उसके पिता संजय हेम्ब्रम द्वारा किया जाता है। परिवार बीपीएल की श्रेणी में आता है, फिर भी बेटी को पढ़ाने और अपनी नई पीढ़ी की ज़िन्दगी के बेहतर बनाने का ख्वाब देखते हैं। वैसे ही जैसे कि सरकार दिखाती है – ‘बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ’ के अभियान द्वारा। 
संजय बताते हैं कि हम मेहनत मजदूरी कर के भी अपने बच्चों को अच्छी शिक्षा देने की सोच कर इस विद्यालय में अपनी बच्ची का नाम लिखवाए थे। पर मेरा सपना अधूरा रह गया।

कविता के माता-पिता की तस्वीर 


4 मार्च 2018 को घर से सुबह तैयार होकर उनकी बच्ची स्कूल के लिये सड़क पर गई और विद्यालय की तीन चक्का वाली ऑटो गाड़ी उसे लेने आई। वह उसी में बैठ कर स्कूल के लिए निकल पड़ी, पर कुछ ही दूर गई थी कि वह गाड़ी दुर्घटनाग्रस्त हो गई। जैसे ही यह सूचना उनके पिता को मिली वह दौड़े दौड़ घटना स्थल पर गए, पीछे से कविता की माँ भी पहुँची। कविता के माथे में चोट था। वह बेहोश पड़ी हुई थी। कुछ ही देर पर घटना स्थल पर पुलिस भी पहुच गई और ऑटो जब्त कर थाने ले गई। कविता को आनन-फानन में सदर अस्पताल कोडरमा में भर्ती कराया गया। 


मृतक स्कूली छात्रा कविता की तस्वीर 
कविता के माता-पिता अपनी बेटी की स्थिति को लेकर काफी चिंतित थे। वहां के डॉक्टर ने उसके बेहतर इलाज के लिए रांची के सरकारी अस्पताल रिम्स रेफर कर दिया, जहाँ कविता की मौत हो गई। दूसरे दिन 5 मार्च के शाम तक कविता को घर लाया गया, जहाँ पीछे से पुलिस भी पहुँची। पुलिस पूरा मामला देख कर लौट आई। पुलिस के अनुसार घर वालों ने पोस्टमार्टम करने से मना कर दिया था। पुलिस उन्हें कानूनी प्रक्रिया समझाने की जरूरत न समझ कर वापस लौट आई। 
इधर विद्यालय प्रबंधन का मानसिक तनाव बढ़ रहा था। उन्हें इस लफड़े से जल्द से जल्द निकलना था। इस कारण गांव के गिने-चुने लोगों को लेकर 6 मार्च को एक पंचायत बुलाई गयी, जिसमें कविता के पिता संजय हेम्ब्रम को भी बुलाया गया। कविता के पिता अभी बेटी के मौत के सदमे से उबरे भी नहीं पाए थे कि पंचायत ने अपना फैसला सुनाते हुए कहा कि 50 हज़ार रुपये संजय को दे दिया जाए और मामला खत्म कर दिया जाए। माता-पिता दोनों लोग गरीब हैं इसका भी ख्याल रखते हुए पंचायत कर रहे लोगों द्वारा एक पेपर पर संजय के हस्ताक्षर हुए और 8000 रुपया संजय को दे दिए गए। बाकी पैसा कुछ दिनों में देना तय हुआ। उधर पुलिस ने जब्त गाड़ी छोड़ दिया क्योंकि गाड़ी थाना के चौकीदार के रिश्तेदार का था। 

30 अप्रैल को पीड़ित परिवार अपना दुखड़ा ले कर थाना पहुँचा तो थाना प्रभारी समझा दिए कि पैसा मिल जाएगा और इस तरह से एक आम इन्सान के लिए न्याय का रास्ता बन्द हो गया। उसके माँ-बाप के लिए आर्थिक रूप से न इतनी क्षमता है, न कानूनी समझ की इस मामले को कैसे आगे बढ़ाया जाय कि न्याय मिल सके। उनके लिए तो पुलिस ही कानून थी, पर वह चुप है। विद्यालय चुप है और पंचायत के लोग भी चुप हैं। आखिर करें, तो करें क्या?
ख़बर लिखे जाने तक, पंचायत में तय मुआवजा के रूप में 25 हज़ार रूपये में से तिपहिया वाहन मालिक ने 23 हज़ार रूपये परिवार को दिया है, जबकि स्कूल प्रबंधन ने तय 25 हज़ार में से सिर्फ 3 हज़ार रूपये ही दिए हैं।

इस पुरे मामले को कोडरमा के मानवाधिकार कार्यकर्ता ओंकार विश्वकर्मा ने मीडिया और राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग के संज्ञान में लाने का प्रयास किया। जब ओंकार ने थाना प्रभारी से बात की और प्राथमिकी दर्ज करने की बात कही, तो उन्होंने कहा कि जब मामले में समझौता हो गया तो प्राथमिकी दर्ज होने का कोई प्रश्न ही नही बनता है। हम इस मामले में कुछ भी नही कर सकते है।
ओंकार कहते हैं, “हमने मामले को लेकर मानवाधिकार आयोग को लिखा है और निवेदन किया है कि मामले को गंभीरता से लेते हुए न्यायिक जाँच किया जाय। अगर इस घटना को छुपाने में थाना प्रभारी की संलिप्तता है तो उनके ऊपर भी कार्यवाही की जाय।”

ओंकार स्कूल प्रबंधन पर भी सवाल उठाते हैं और कहते है कि बच्चों के आवागमन के लिए तिपहिया वाहन का प्रयोग करना भी स्कूल प्रबंधन की लापरवाही दिखाता है