Wednesday, April 11, 2018

जातिवादी मानसिकता के ज़हर के दंश से कराहता भारतीय समाज

हमारे देश को आजाद हुए 70 साल बीत चुके हैं। लेकिन भारतीय समाज में जातिवादी जडें अभी भी अपना पुराना रूप परिवर्तित कर जमी बैठी हैं। जातिवादी मानसिकता से ग्रसित लोग आज भी अपने वर्चस्व को बनाए रखने के लिए तरह-तरह से अत्याचार करते हैं। इसे हम अपने आसपास के गाँव-मोहल्लों, अखवार की खबरों और न्यूज़ चैनलों के प्राइम-टाइम पर देख सुन पढ़ सकते हैं। 

तस्वीर जागरण जंक्शन से साभार 


भारतीय इतिहास को हम जानने की कोशिश करें तो हम पाते हैं कि जाति-व्यवस्था के कारण शूद्रों पर अत्याचार तो हुए ही लेकिन भारत देश को इसका बहुत बड़ा खामियाजा भी भुगतना पड़ा। भारतीय समाज चार भागों में बाटे होने के कारण आपसी मतभेद, बाहरी लोगों को अंदर आने के लिए सुगम लगे। वरना चंद लोग शककुषाण, हूण, मुगल, अंग्रेज आदि आकर  इतनी बड़ी आवादी पर कैसे हुकूमत कर सकते हैं? इसके और भी कारण हैं लेकिन इसका एक बहुत बड़ा कारण यह भी है। भारत में कई आक्रमणकारी आए और एक के बाद एक अपने मक़सद में कामयाब भी हुए। 
वर्ण-व्यवस्था से उत्पन्न जाति-व्यवस्था ने हमारे भारतीय समाज को गहरे से प्रभावित किया है। ऊँच-नीच, छुआछूत, आपसी भेदभाव इसी की देन है। फिर भी इस व्यवस्था से पोषित लोग इसे बनाए रखने के लिए आम जनों को न समझ में आने वाली गूढ़ अर्थों में धार्मिक व्याख्याएँ करते हैं और उसे पुनर्स्थापित कर जातिवादी शोषण को जारी रखने की कोशिश करते हैं। यहाँ तक कि इसे ईश्वरीय सत्य बताने की कोशिश करते हैं जिससे धर्म में आकंठ डूबा भारतीय जनमानस इसे तर्क द्वारा चुनौती नहीं दे सके।

वर्ण व्यवस्था से उत्पन्न जाति-प्रथा और आपसी भेदभाव के कारण भारतीय समाज में अनेक धर्म सम्प्रदायों का उदय हुआ। उनका मूल मक़सद इस भेदभावपूर्ण व्यवस्था से निजात पाना रहा, लेकिन इनके द्वारा जातिवादी जडें कमज़ोर जरूर हुईं, खत्म नहीं।
इस जातिवादी जहर से कुछ लोगों के स्वार्थ जरुर सिद्ध होते हैं और उनका वर्चस्व बना रहता है, पर बहुसंख्य जनता इससे जहर के दंश से कराहती रहती है। इसी व्यवस्था से पोषित और सत्तासीन लोग इसे बनाए रखने के लिए अपने से तथाकथित नीच समझे जाने वाले लोगों पर अत्याचार करते हैं और हत्या तक कर देते हैं।

डॉ. भीमराव आंबेडकर ने कहा था, "हम आजादी मिलने के बाद राजनीतिक रूप से एक राष्ट्र तो हो जाएंगे, लेकिन सामाजिक रूप से एक राष्ट्र तब तक नहीं हो सकते, जब तक जातिप्रथा को खत्म न कर दिया जाए।" इसके समाधान के लिए उन्होंने संबंधित धार्मिक मान्यताओं को खत्म करने की बात कही।

भारत को आजादी मिलने के बाद संविधान निर्माण के साथ ये उम्मीद लगाई गईं थी कि इसके लागू होने से जातिवादी ज़हर को तिलांजलि मिलेगी, लेकिन आज भी यह अपने छद्म भेष में मौजूद है। वर्तमान भारतीय लोकतंत्र अब राजनीतिक पार्टियों का अखाडा बन कर रह गया है, यहाँ वे बड़े-बड़े वादे करते  हैं और वास्तविक धरातल पर शोषितों, पीड़ितों और पिछड़ों की हिमायती ही बनी रहती हैं। इन वादों और मुद्दों का एक बड़ा केंद्र उनके लिए जातिभेद आधारित चुनावी प्रचार होता हैं, जिस आधार पर वे चुनाव जीतकर आती हैं, पर असल में आम लोगों के लिए वे कोई काम नहीं करते, सिर्फ वादा-वादा चलता रहता है। इस कारण भारतीय संविधान द्वारा जो अधिकार नागरिकों को मिले थे, वह भी धीरे-धीरे कमजोर होते जा रहे हैं। 

इससे हमारे जेहन में एक सवाल खड़ा होता है। क्या किसी विशेष समुदाय अथवा जाति मात्र के लोगों के सत्ता में दखल होने और विशेषाधिकार प्राप्त होने से एक सशक्त राष्ट्र का निर्माण हो सकता हैक्या जातिवादी मानसिकता के कारण उत्पन्न छुआछूत, शोषण, भेदभाव आदि से भारतीय सामाज सामाजिक रूप से एक हो सकता है? 

क्या ऐसे में जरुरी नहीं है कि जाति के आधार पर शोषित-दमित जनता को ऊपर लाने का प्रयास किया जाय? कोई सरकार इसकी जिम्मेदारी लेने को तैयार नहीं है।

हाल ही में प्रदीप नाम के एक 21 वर्षीय दलित युवक की गुजरात के भावनगर में दबंगों ने इसलिए हत्या कर दी, क्योंकि वह घोड़ी की सवारी करता था। उसके पिता ने बताया कि जब से घोड़ी खरीदी है, तब से धमकी मिल रहीं थी घोड़ी को बेच दे नहीं तो जान से मार देंगे। 

पिछले कुछ दिनों गुजरात में ही दलितों के मूँछ रखने पर उनकी पिटाई की गई थी। इस तरह का अत्याचार रोज़ाना जगह-जगह होता रहता है।

ऐसी घटनाएं यह साबित करती हैं कि शोषित-उत्पीड़ित जनता को ही इनके खिलाफ उठ खड़ा होना होगा और उन्हें यह समझना पड़ेगा कि बगैर सामाजिक क्रांति के जीवन की परिस्थितियाँ नहीं बदलती। कोई भी विशेषाधिकार प्राप्त वर्ग अपने अधिकारों को आसानी से तिलांजलि नहीं देता, क्योंकि इस समाज में अधिकार मुफ्त में नहीं मिलता, उसके लिए कीमत चुकानी पड़ती है।

– अशोक कुमार सखवार
(लेखक साँची बौद्ध-भारतीय ज्ञान अध्ययन विश्वविद्यालय, मध्य प्रदेश में पी-एच. डी. शोधार्थी हैं।)