Sunday, February 04, 2018

अशोक कुमार सखवार की तीन कवितायेँ

1.  जाति

सत्ता भोगी स्वार्थियों ने वनाये वर्ण
वर्ण से उत्पन्न हुई ‘जाती’
जो एक बार जन्म लिया कभी नहीं जाती
चाहे भजन करों दिन-राती
उत्पन्न हुआ भारत में वैमनस्य कारण ‘जाती’
फिर भी भरते दंभ कारण उच्च ‘जाती’
भारतीय मानवता खतरे में है कारण ‘जाती’
भारत पर आक्रमण हुए भांती-भांती
क्यों की हम बटे थे कई ‘जाती’
बाटे थे सभी के काम
कोऊ मरे हमें बाते कहा काम
हम तो है उच्च ‘जाती’
हमाओ तो बटो है काम
चाहे कछू होए हमें बाते कहा काम
मिल गई स्वतंत्रता
फिर भी नहीं ‘जाती’ जाती
होते रहते हैं शोषण जाति के नाम पर भांति-भांति
क्यों कि हम तो है  उच्च ‘जाती’



2.  जमघट्ट

स्वार्थ से निर्मित
जमघट्ट के ठेकेदार 
अपने जमघट्ट में
मानवीय मूल्यों को
गला फाड़-फाड़ कर गिनाते हैं ।
काल्पनिक तर्कों के
शब्द जाल गढ़ते हैं ।
चुनिंदा लिखित तर्क
बड़े शान से रखते हैं ।
बात करते हैं समुद्र की
बूँद से संतुष्ट करते हैं ।
जब आप के जमघट्ट में हैं
इतनी अच्छाईं
क्यों गिनाने पड़ती हैं ।
जब इनसे पूछा जाता है ।
जमीनी स्तर पर ऐसा हो रहा है क्या?
तब आप को कई
शब्दों से नवाज़ते हैं ।
3.   स्व घोषित राजा की कुरसी

कब तक इस ढहती
जर जर अट्टालिका को बचा पाओगे ।
विज्ञान की खोजो के
सामने कैसे टिक पाओगे ।
कब तक थेगरी
लगा लगा कर चिपकाओगे ।
कब तक लोगों को
कठपुतली नाच नचाओगे ।
जब टूटेगी ये स्वार्थी गारे की दीवारें
तब नकाब विहीन हो जाओगे ।
तब तुम अपने 
अशली चेहरे को कैसे छुपा पाओगे ।
कब तक इस भेदभावपूर्ण व्यवस्था की
चार पैरों वाली कुर्शी पर बैठ पाओगे ।
कब तक परम पुरुष के
प्रतिनिधि अपने आप को कहलाओगे ।
चल पड़ी है अब शिक्षा की आधी
अब नहीं बच पाओगे ।
जब तक लोग हैं अनजान
तब तक ही बच पाओगे ।
कब तक अपनी कलुषित मानशिकता से
लोगों को शब्द जाल में फसाओगे ।
कब तक परम पुरुष के प्रतिनिधि के रूप में अपने आप को बताओगे ।
एक दिन इसी मकड़ जल में
खुद को फसा पाओगे ।
कब तक इन जर जर दीवारों के
ऊपर अट्टालिक बनाओगे ।
कब तक अपनी स्वार्थी व्यवस्था के
भ्रमजाल में लोगों को फसाओगे ।
अभी भी वक्त है समलने का
नहीं तो विश्व के सामने वेनकाब आपने आप को पाओगे ।


ई-मेल : ashoksakhwar@gmail.com