Monday, January 29, 2018

रोहित वेमुला के जन्म दिवस पर

आयरलैंड के राजनीतिक विचारक एडमण्ड बरक ने 1789 की फ़्राँसी क्रांति के समय कहा था के "जो लोग इतिहास को याद नहीं रखते, वो उन गलतियों को दोबारा दोहराने की अपराधिक क्षमता रखते हैं"। 
हाल ही में हुई एक महत्वपुर्ण घटना जिसको मुख्यधारा के ज़्यादातर मीडिया संस्थानों ने उजागर करने की बजाये दबा दिया वह हैदराबाद सेंट्रल यूनिवर्सिटी की है। हैदराबाद सेंट्रल यूनिवर्सिटी के अर्थशास्त्र के प्रोफेसर के. लक्समीनारायणा जिन्होंने आज से ठीक दोःसाल पहले रोहित वेमुला की संस्थागत तौर से की गई हत्या के विद्रोह में एक अहम भूमिका निभाई थी उनको अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद् के राष्ट्रीय सह-संयोजक और पी-एच.डी के छात्र करन पलसानिया ने फेसबुक पर खुलेआम जातिवादी गाली देते हुए टिप्पणी की। करन पलसानिया के खिलाफ प्रोफेसर के. लक्समीनारायणा ने दिसंबर के महीने में ही जातिगत उत्पीड़न रिपोर्ट यूनिवर्सिटी में दर्ज करा दी थी। लेकिन अभी तक करन पलसानिया के खिलाफ यूनिवर्सिटी ने 'कारण बताओ नोटिस' के अलावा कोई कार्यवाही नहीं की है। अगर गौर फ़रमाया जाये तो आज से ठीक दो साल पहले यूनिवर्सिटी प्रशासन ने रोहित वेमुला और अन्य कई स्टूडेंट्स को बिना किसी वजह और जांच से पहले ही हॉस्टल से निकाल कर दंडित कर दिया था। कई महीने सड़क पर रहने को मजबूर कर और प्रशासन के जातिगत भेदभाव और रवैये के चलते रोहित वेमुला ने ख़ुदकुशी कर ली थी। दुनिया भर में आजतक रोहित वेमुला को न्याय दिलाने की लड़ाई को लड़ा जाया जा रहा है परन्तु मौजूदा हालत इतने बद से बदत्तर हो गए हैं के केंद्र में बैठी भाजपा सरकार के छात्र यूनियन ने एक बार फिर से हैदराबाद सेंट्रल यूनिवर्सिटी में इस बार रोहित वेमुला को न्याय दिलाने में सक्रिय रहे प्रोफेसर को निशाना बनाया गया जब उन्होंने अर्थशास्त्र के प्रश्न पत्र में शिक्षा और शिक्षण संस्थानों के भगवाकरण के पीछे की आर्थिक नीतियों का विश्लेषण करने का सवाल पूछ लिया। यह घटना ही इस सवाल का जवाब बन जाती है और शिक्षा के संस्थानों और शिक्षा नीतियों के भगवाकरण की पुष्टि करती हैं। भारत में हर साल सिर्फ मज़दूर, किसान के ख़ुदकुशी का दर ही नहीं बल्कि युवा पीड़ी का भी ख़ुदकुशी करने का दर बढ़ रहा है और इसकी ज़िम्मेवार ज़्यादातर कारण भारत की मौजूदा आर्थिक, सामाजिक और राजनितिक हैं।

अगर हम इन परिस्थितयों को बदलना चाहते हैं तो हमे इतिहास में धौरई गलतियों को याद कर एक नई समझदारी के साथ आगे आना होगा। यह नई समझदारी भी इतिहास में किये गए संघर्षों से ही आती है। जिस वर्गीय चेतना की बात रोहित अपने सुसाइड नोट में करते हैं उस आग को हमें आगे बढ़ाना होगा। 

मौजूदा हालत में बस अदम गोंडवी की यही कविता रोहित के शहादत पर याद आती हैं -
काजू भुने पलेट में, विस्की गिलास में
उतरा है रामराज विधायक निवास में
पक्के समाजवादी हैं, तस्कर हों या डकैत
इतना असर है ख़ादी के उजले लिबास में
आजादी का वो जश्न मनायें तो किस तरह
जो आ गए फुटपाथ पर घर की तलाश में
पैसे से आप चाहें तो सरकार गिरा दें
संसद बदल गयी है यहाँ की नख़ास में
जनता के पास एक ही चारा है बगावत
यह बात कह रहा हूँ मैं होशो-हवास में ।

 – रेड पैंथर