Saturday, October 05, 2019

लोकतन्त्र में शक्ति का स्रोत जन-प्रतिनिधि नहीं, बल्कि स्वंय जनता है


जब जनता शासन हेतु कुछ व्यक्तियों को जनप्रतिनिधि चुनती है तो उन्हें प्रशासन के सुचारू रूप से सञ्चालन में बाधा न होइसलिए कुछ अधिकार और विशेषाधिकार भी देती हैपर साथ में जनता अपना विकासन्याय आदि की जिम्मेदारी भी जनप्रतिनिधियों को सौंपती है। जिससे प्राकृतिक संसाधनों का जनता के हित में प्रयोग और संरक्षण होजनता अपनी अभिव्यक्तिपर्यावरण और संस्कृति को कायम रखने हेतु स्वतंत्रता का उपयोग करे और समाज में समृधिशांति- सदभावना का प्रसार हो।

जब जन-प्रतिनिधि अपनी जिम्मेदारी और कर्तव्य को जान-बूझकर नज़र अंदाज़ करने लगें और अपने निहित स्वार्थों की पूर्ति हेतु पद और विशेषाधिकार का दुरूपयोग करने लगें। जनता के इस सब के विरोध करने पर कानून के नाम पर जन-प्रतिनिधि जनता के विरुद्ध शक्ति का प्रयोग करने लगेवे भूल जायें कि शक्ति का स्रोत वे नहींबल्कि स्वंय जनता हैजो उन्हें समाज के सामूहिक हित में सौंपी हैतो यह समझना चाहिए कि जन-प्रतिनिधि जनता का हित नहीं कर रहेबल्कि शोषक और उत्पीडक बन गए हैं।

Tuesday, June 04, 2019

चाकुलिया की जमुना दीदी पर्यावरण संरक्षण के लिए समूचे देश की प्रेरणा हैं


दुनिया भर में पर्यावरण चिंता का विषय बना हुआ है। बढ़ती जनसंख्या, दिनों दिन घटते जंगल पर्यावरण संतुलन को तहस-नहस कर रहे है। विकास की अंधाधुंध दौड़ में सबसे ज्यादा नुकसान पर्यावरण को ही होता है। अब पर्यावरण व पेड़ो को बचाने के लिए तरह-तरह के प्रयोग सुनने को मिलते है। फिलीपींस में 10 पेड़ लगाने के बाद ही ग्रेजुएशन की डिग्री का अनूठा प्रयोग इनदिनों चर्चा में है, वही चंबल इलाके में हथियारों के एप्लिकेशन हेतु कम से कम 10 पेड़ लगाकर एक महीने तक पेड़ो की सेवा करने का आदेश आया है। 

इन सभी सुर्खियों से इतर झारखण्ड राज्य के पूर्वी सिंहभूम जिले स्थित चाकुलिया की जमुना टुडू दीदी आज पर्यावरण संरक्षण के लिए समूचे देश की प्रेरणा है। जमुना दीदी ने लगभग 22 सालों पहले जंगलों को बचाने की मुहिम शुरू की थी। आज जमुना जी की प्रेरणा से वन समितियों से जुड़ी हज़ारों महिलाएं रोजाना जंगलों की देख भाल करती है। 

जंगल माफियाओं के जानलेवा हमलों से सालों-साल लोहा लेते हुए सैकड़ों बीघे जंगल बचाने का सफर आसान नहीं था, यहां पग-पग पर रास्ते कंटीले है। इन कंटीले रास्तों पर चलते हुए जमुना दीदी ने गांव से राष्ट्रपति भवन तक का सफ़र तय किया। सभी को जमुना दीदी की कहानी विस्तार से जरूर जाननी चाहिये।

Wednesday, March 20, 2019

"जयपाल सिंह के साथ इतिहासकारों ने न्याय नहीं किया" - विनोद कुमार

         तस्वीर आदिवासी लेखिका वंदना टेटे की वाल से साभार।       



















जयपाल सिंह के बारे में भ्रम बनाया गया है। जययपाल सिंह जितने बड़े कद काठी के नेता थे, उतनी जानकारी मुख्यधारा के बौद्धिक समाज में उनके बारे में नहीं। किसी से आप पूछेंगे, तो तीन चार लाईन में उन्हें निपटा दिया जायेगा। वे हॉकी के एक महान खिलाड़ी थे। झारखंड पार्टी के नेता थे। और जो सबसे लोकप्रिय प्रवाद उनके बारे में है कि उन्होंने झारखंड आंदोलन को अपनी विलासिता के लिए बेच दिया। विडंबना यह कि उनके दौर के कई अन्य झारखंडी बुद्धिजीवी भी उनके बारे में यही राय रखते हैं।

आप उसे मुख्यधारा के इतिहासकारों की एक गहरी साजिश भी कह सकते हैं। वरना एक ऐसा शख्स जो हॉकी के महानतम खिलाड़ियों में से एक है, एक छोटे से आदिवासी गाँव से निकल कर जो आक्सफोर्ड से अर्थशास्त्र का गोल्ड-मेडलिस्ट बनता है, जो काँग्रेस की लोकप्रियता को चुनौती दे, 1952 और 57 के विधानसभा चुनाव में 34 सीटें जीत कर काँग्रेस का सफाया कर देता है। जो संविधान सभा के सदस्य के रूप में अपने समानांतर अंबेडकर सहित किसी अन्य नेता से कम प्रखर नहीं, को तीन चार पंक्तियों में निपटा देना एक क्रूर मजाक नहीं तो क्या है?

आज हम आपसे संक्षेप में सिर्फ उस आरोप की चर्चा करेंगे जिसमें कहा जाता है कि उन्होंने काँग्रेस के साथ पार्टी का विलय कर बहुत बड़ी भूल की। दरअसल, झारखंड की आज की राजनीति और उसकी नियति को समझने के सूत्र वहीं से निकलते हैं।

Saturday, February 23, 2019

‘Historic Injustice’ to Adivasis made permanent

Whereas previously SC affirmed indigenous people’s inalienable rights to their land, it now orders their eviction from their land unilaterally.
                                                                                                   – Stan Swamy 

Picture Courtesy Stan Swamy’s FB Wall

There are three significant SC judgments on the indigenous Adivasi people’s rights over their land and natural resources:

1) In 2011 the SC, hearing a complaint petition by a young Adivasi woman who was raped and paraded naked by upper caste persons in a Maharashtra village, observed “The ancestors of the present tribals or Adivasis (Scheduled Tribes) were the original inhabitants...  The injustice done to the tribal people of India is a shameful chapter in our country's history. The tribals were called ‘rakshas' (demons), ‘asuras', and what not. They were slaughtered in large numbers, and the survivors and their descendants were degraded, humiliated, and all kinds of atrocities inflicted on them for centuries.

They were deprived of their lands, and pushed into forests and hills where they eke out a miserable existence of poverty, illiteracy, disease, etc. And now efforts are being made by some people to deprive them even of their forest and hill land where they are living, and the forest produce on which they survive… Despite this horrible oppression on them, the tribals of India have generally (though not invariably) retained a higher level of ethics than the non-tribals. They normally do not cheat or tell lies, or commit other misdeeds, which many non-tribals do. They are generally superior in character to non-tribals. It is time now to undo the historical injustice to them.”  [SC Criminal Appeal 11 of 2011]

Friday, February 22, 2019

आदिवासियों को जंगल ख़ाली करने का आदेश देना अनैतिक है


सुप्रीमकोर्ट ने क़रीब 16 राज्यों के लाखों आदिवासियों और पारंपरिक जंगलवासियों को जुलाई तक जंगल ख़ाली करने का आदेश दिया। आदिवासी जंगलों में तब से रह रहे हैं जब देश की सीमा भी निर्धारित नहीं हुयी थी। उनकी संस्कृति इतनी पुरानी है कि जब आपका इतिहास शुरू भी नहीं हुआ था। न आपका मौजूदा क़ानून था, न न्यायालय न संविधान। 

वो जहाँ रह रहे हैं, प्राकृतिक न्याय के हिसाब से वहाँ जल-जंगल-ज़मीन के असली मालिक हैं। उनको वहाँ से उजाड़कर कहीं और भेजना मौजूदा क़ानून, संविधान, न्यायालय, राजनैतिक सीमा की नैतिक हैसियत से बाहर है। देश के तथाकथित विकास के लिए उनके जल-जंगल-ज़मीन से उन्हें बेदख़ल करना न्याय की किसी भी परिभाषा से सही नहीं हो सकता।

Thursday, January 31, 2019

मीडिया भी हिंदू महासभा की तरह घृणा करती है गांधी से


हिंदू महासभा ने गांधी के पुतले पर गोली चला कर उनकी हत्या के जख्म को ताजा कर दिया और उनकी तस्वीर खूब चली सोसल मीडिया में और टीवी के चैनलों पर। जाहिर है कि उन्होंने गांधी के प्रति अपनी घृणा का खुल कर प्रदर्शन किया।

लेकिन यही काम आज स्थानीय मीडिया और हिंदी के तमाम अखबारों ने किया। किसी अखबार ने बापू की शहादत दिवस पर उन्हें याद करने या उनके प्रति अपनी श्रद्धांजलि अर्पित करने की जरूरत नहीं समझी। 

यहां तक कि प्रभात खबरने भी नहीं, जिनके पूर्व प्रधान संपादक और अब राज्यसभा के उपाध्यक्ष बन गये हरिवंश चार दिन पहले यहां के एक समारोह में यह बता गये कि ‘‘गांधी दुनियां के लिए विकल्प नहीं, मजबूरी’’, ‘‘गांधी सदा प्रासांगिक और प्रेरणास्रोत रहेंगे’’ लेकिन चार दिन बाद गांधी के शहादत दिवस पर गांधी को भुला कर मीडिया ने बता दिया कि गांधी की जरूरत अब उन्हें नहीं रही।

हो सकता है,मीडिया यह कहे कि उनके पास गांधी के शहादत दिवस पर कोई सरकारी विज्ञापन गांधी की तस्वीर के साथ नहीं आया और गांधी को याद करते हुए किसी समारोह की तस्वीर नहीं आई तो वे क्या समाचार गढ़ते? यह सचमुच बाजिब तर्क है। लेकिन इसका निहितार्थ हुआ यह कि भाजपा के सत्ता में आते ही गांधी के प्रति अवमानना शुरु हो गई। 

यह अलग बात कि परंपरा का निर्वाह करते हुए प्रधानमंत्री कल सुबह राजधाट जा कर फूलमाला चढ़ा आये थे। लेकिन संघ परिवार के हृदय में गांधी के प्रति वही घृणा है जिसकी चरम अभिव्यक्ति हिंदू महासभा ने की।

Thursday, January 24, 2019

ईसाई आदिवासी नक्सली हैं, ऐसा कहना बिल्कुल गलत है!

पिछले दिनों साथी Gani Manjhi के एक पोस्ट में चर्चित लेखिका मधु किश्वर का एक वक्तव्य देखने को मिला जिसमें कहा गया था कि मध्य भारत के ईसाई आदिवासी नक्सल हैं। यह ज्ञान उन्हें कहां से मिला यह समझ से परे है। किसी समाजशास्त्री ने यह बात पूर्व में कही होयह मुझे देखने को नहीं मिला। हांयह धारणा शहरी बुद्धिजीवियों के द्वारा जरूर बनाई और फैलायी गई है कि आदिवासी नक्सली हैं या माओवादी आदिवासियों के हितों की रक्षा के लिए संघर्ष कर रहे हैं। हालांकि यह भी एक अधूरा सच ही है।

ईसाई को नक्सल कहने से सम्बंधित मधु किश्वर का एक ट्विट यह भी।

दरअसल, आरएसएस और संघ परिवार हिंदू मतों के अपने पक्ष में ध्रुवीकरण के लिए एक तरफ तो मुसलमानों को टारगेट कर रहा है और दूसरी तरफ आदिवासीबहुल इलाकों में ईसाईयों को। उन पर आरोप लगाया जाता है कि वे आदिवासियों का धर्मांतरण कर रहे हैं। वे चाहते हैं कि आदिवासी आर्थिक रूप से विपन्न और पिछड़े बने रहें, इसलिए वे विकास का विरोध करते हैं। 

हाल के दिनों में खूंटी में चले पत्थरगड़ी आंदोलन को भटकाने का भी आरोप उन पर लगाया गया। मदर टरेसा के आश्रम पर यह आरोप लगाया गया कि वे नवजात शिशुओं को बेचते हैं। मधु किश्वर का एक कार्यशाला में दिया गया वक्तव्य भाजपा सरकार के इसी प्रोपगेंडा को हवा देता है।